Punjab ‘ਚ ਆਉਣ ਵਾਲਾ ਵੱਡਾ ਸੰਕਟ 12,000 साल पहले इंसान क्या कर रहा था?
निश्चित रूप से किसी अपार्टमेंट में नहीं रह रहा था। गुफाओं में रहता होगा। मगर इस समय तक घुमंतु जीवन जीने लगा था। और झोपड़ी जैसी चीज बनाने लगा था। हेलीगुब्बी पहाड़ में 12,000 साल से निष्क्रिय एक ज्वालामुखी फटा। तो उसकी राख का गुबार दो दिनों में अफ्रीका से चलकर भारत तक आ गया। भारत में ज्वालामुखी कहां है? बैरन आइलैंड, अंडमान, निकोबार। ऐसा नहीं है कि इथोपिया में ज्वालामुखी बिना किसी चेतावनी के फट गया। आमतौर पर इनके फटने से पहले कुछ संकेत मिलने शुरू हो जाते हैं। जमीन के नीचे लावा के दबाव में बदलाव होता है। धुआं निकलता है। छोटे-छोटे भूकंप आने लगते हैं। इसी साल जुलाई में इस पर्वतमाला के एक दूसरे ज्वालामुखी से धुआं निकलने लगा। जमीन के नीचे दबाव में कुछ बदलाव हुआ और उभार दिखने लगे। लोग सुरक्षित स्थानों पर चले गए। लेकिन इस ज्वालामुखी के आसपास कई 100 किलोमीटर दूर तक के गांव में राख की चादरें बिछ गई हैं। मवेशियों के लिए चरने की जगहें खत्म हो गई हैं।
लोगों का कहना है कि जब ज्वालामुखी फटा तब लगा कोई बहुत बड़ा बम फटा है। यहां की अर्थव्यवस्था पर इस धमाके का बुरा असर पड़ा होगा। हेलीगुब्बी का यह ज्वालामुखी 12,000 साल से सोया रहा और जब जागा तो झट से भारत तक आ गया। राख से भरे बादल हवाई जहाज के लिए खतरा हो सकते हैं। इसलिए कई उड़ानों को रद्द करना पड़ा। डीजीसीए ने चेतावनी जारी की। हवाई जहाज के इंजन का तापमान अधिक होता है और उसमें राख पिघलकर पुरजों को खराब कर सकती थी। टरबाइन ब्लेड्स में राख चिपक जाती। ज्वालामुखी की राख में सल्फर डाइऑक्साइड और कार्बन डाइऑक्साइड बड़ी मात्रा में घुले होते हैं। इसके अलावा हाइड्रोजन सल्फाइड, हाइड्रोजन क्लोराइड, हाइड्रोजन फ्लोराइड और सीमित मात्रा में कार्बन मोनोऑक्साइड भी निकलती है। पहले से ही दिल्ली की हवा प्रदूषित है। और अब एक और चुनौती आ गई। हवा में 14 किमी ऊपर तक फैली इसकी राख इथोपिया से चलकर दुनिया के अलग-अलग देशों में पहुंची है। लाल सागर पार करते हुए यह यमेन, ओमान, पाकिस्तान और दिल्ली तक आई है।
इसके असर की बात कर ही रहे हैं। लेकिन हेलीगुब्बी को लेकर जो आंकड़े हैं, उसकी बात भी करना चाहते हैं। इथोपिया का अफार क्षेत्र सक्रिय ज्वालामुखी का अड्डा माना जाता है। यहीं पर है हेलीगुब्बी जहां 12,000 साल से निष्क्रिय एक ज्वालामुखी फटा है। आज पूरी दुनिया में इसकी चर्चा है। वीडियो वायरल है। जब यह ज्वालामुखी फटा तब दुनिया पूरी तरह से बदल चुकी है। ज्वालामुखी से धुआं निकलने की तस्वीर आते ही दुनिया के करोड़ों मोबाइल फोन में उसका वीडियो वायरल हो गया है। इस घटना को समझने के लिए आपको इतिहास भी समझना चाहिए और भूगोल भी। जिस पर्वत श्रृंखला में यह ज्वालामुखी फटा है, वह ईस्ट अफ्रीकन रिफ्ट जोोन के मुहाने पर है। ईस्ट अफ्रीकन रिफ्ट जोोन क्या है? असल में पूरी दुनिया अलग-अलग टेक्टोनिक प्लेट में बंटी हुई है। यह पत्थर के भीमकाय स्लैब हैं जो लावा के ऊपर तैर रहे हैं। साल में बस कुछ सेंटीमीटर या मिलीमीटर ही खिसकते हैं।
लेकिन इतने से धरती झटका खा जाती है जिसे आप भूकंप कहते हैं। इन्हीं प्लेट के किनारे ज्वालामुखी फटते हैं। कुछ प्लेट जमीन के नीचे होती है और कुछ समुद्र के नीचे। इन्हें कॉन्टिनेंटल या ओशियनिक प्लेट कहा जाता है। कभी ये एक दूसरे से टकराती हैं, कभी एक दूसरे से रगड़ खाती हुई गुजर जाती हैं। या फिर एक दूसरे से दूर चली जाती हैं। अफ्रीका में जो हुआ है और हो रहा है, वो इस तीसरी श्रेणी की प्रक्रिया है। यहां हेलीगुबी ज्वालामुखी फटा है। यह वो इलाका है जहां पर अफ्रीका की प्लेट धीरे-धीरे दो हिस्सों में बट रही है। इस नक्शे में देखिए, पूर्व की तरफ लाल सागर है और दूसरी तरफ दक्षिण में जिंबाब्व है। 6,000 कि.मी. की इस दरार को ईस्ट अफ्रीकन रिफ्ट ज़ोन कहते हैं। यह तस्वीरें उसी रिफ्ट ज़ोन के एक अन्य ज्वालामुखी माउंट किली मांझारो के इलाके की है। ईस्ट अफ्रीकन रिफ्ट ज़ोन एक तरह से विशालकाय घाटी है जो अफ्रीकन प्लेट और सोमालियन प्लेट के एक दूसरे से दूर खिसकने के कारण बन रही है। इस घाटी में कई तरह के तालाब और जलाशय बन गए हैं। जानवरों की करोड़ों प्रजातियां इस इलाके में पाई जाती हैं। क्योंकि जमीन के दूर जाने से बनी खाली जगह में पानी इकट्ठा हो गया है। जब दोनों प्लेट एक दूसरे से दूर जाती हैं, तो लावा के निकलने के लिए जगह बनने लगती है। इसीलिए दुनिया के कई ज्वालामुखी इस इलाके में पाए जाते हैं और इनमें से एक है हेलीगुबी। 12,000 साल बाद रविवार सुबह फट पड़ा।
कितनी बार आप सुन रहे हैं 10,000 साल बाद फटा। 12,000 साल बाद फटा। 12,000 साल पहले इंसान क्या कर रहा होगा? उस समय को होलो सीन कहा जाता है जब कई हजार साल के दौर के बाद धरती गर्म होने लगी और बर्फ की चादरें पिघलने लगी। कुछ लोग कहते हैं होलोन आज भी जारी है। लेकिन इस कालखंड को एंथ्रोपोसिन कहा जाता है। इसके उच्चारण अलग-अलग हो सकते हैं। इस तरह के नाम क्यों दिए जाते हैं? इस पर भी बहस है। अमिताभ घोष ने इस छोटी सी पुस्तिका महापर्वत में इस शब्द और इसके पीछे की अवधारणा इसके नाम का मजाक उड़ाया है कि यह क्या नाम है और इससे क्या मतलब निकलता है। समझने के लिए हम इस कालखंड को इंसानों के फितूर से प्रभावित मान सकते हैं। उसने प्रकृति पर विजय प्राप्त करने का भ्रम भी पाया और कई जगहों पर विजय प्राप्त किया भी। आखिरी 200 वर्षों में इंसानों ने अपनी क्षमता से धरती पर जो उत्पात मचाया है, उसे बदला है, उससे आया है जलवायु संकट। तरह-तरह की आपदाओं से घिरा हुआ है हमारा यह समय। इसीलिए शायद इसे अजीब नाम एंथ्रोपोसिन से पुकारा जा रहा है। क्योंकि इंसान ने धरती को बदला तो है। 12,000 साल के आखिरी 200 साल में कितना कुछ बदल गया। जिस धरती को इंसान बदल रहा था उसे ही रहने लायक नहीं छोड़ा।
इसकी जलवायु को संकट में डाल दिया और अनगिनत जीव-जंतु धरती से गायब कर दिए गए। जंगलों को धरती से मिटाया जा रहा है और मिटाने पर लोग अभी भी तुले हुए हैं। खैर बर्फ पिघलने के बाद मौसम सुहाना होने लगा और इंसान की कल्पनाएं जागने लगी। पत्थर के औजार बनने लगे। खेती शुरू हो गई। हिमयुग के खत्म होते ही इंसान चल पड़ा नए-नए इलाके की ओर, जहां खेती की संभावना मिली, वहीं बसने भी लगा। इंसानों की आबादी में विस्फोट होने लग जाता है। आबादी बढ़ती है और फिर से खेती के नए जगहों की तलाश में पलायन का एक और दौर शुरू होता है। तो 12,000 साल पहले जब धरती से बर्फ की चादरें हटी तब उसका लाभ उठाने के लिए इंसान दुनिया के कई हिस्सों में फैल चुका था। मगर यहां तक आने के लिए इंसान को इसी अफ्रीका से 65,000 साल पहले से अपनी यात्रा शुरू करनी पड़ी। जब इंसानों का काफिला अफ्रीका से निकलता है, दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में जाता है। हम उस समय की बात कर रहे हैं। आज उन इलाकों को आप देश के नाम से जानते हैं। तब कोई देश था नहीं। कोई सीमा नहीं थी। बस इंसानों ने चलना शुरू किया। चलते रहे, बसते रहे।
अफ्रीका से निकले लोगों का कारवा भारत कब पहुंचा इसकी जानकारी जेनेटिक्स से नहीं मिल पाती। पुरातत्व से 65,000 साल पहले भारत में आधुनिक मानव के निशान मिलते हैं। भीमबेटका में कलाकृतियां बनाई जाने लगी थी। इंसानों में छोटे-छोटे घर बनाकर रहने की आदत पनपने लगी थी। पशुपालन शुरू होने लगा था। हम साफ-साफ कहना चाहते हैं, हम हर विषय के ज्ञाता नहीं हैं और इस विषय के भी नहीं। टोनी जोसेफ ने एक किताब लिखी है अर्ली इंडियन। उसी से मोटा-मोटी बता रहा हूं। आपको यह किताब पढ़नी चाहिए। कितनी अजीब बात है कि आज भी अफ्रीका और भारत का रिश्ता बनता रहता है। भारत की आजादी की लड़ाई का बीज भी अफ्रीका में अंकुरित हुआ। महात्मा गांधी वहां से चलकर भारत आए और लड़ाई का एक लंबा दौर शुरू करते हैं। उस लड़ाई का परीक्षण अफ्रीका में ही करते हैं। तो इस तरह के रिश्ते अफ्रीका से हमारे बन जाते हैं। केवल अफ्रीका के अफार रेंज में जो ज्वालामुखी फटा है उसकी राख भारत नहीं आई। इसी तरह जब अफ्रीका में विश्व कप हुआ तब शकीरा का गाना भारत की गली-गली में मशहूर तो हो ही गया। और जब ज्वालामुखी फटने की घटना होती है उससे कुछ दिन पहले भारत के प्रधानमंत्री मोदी जोहनसबर्ग में G20 की बैठक में शामिल हो रहे थे। प्रकृति की शक्ति का इंसान सामना नहीं कर सकता।
मुकाबला भी नहीं। भूकंप कौन रोक सका और चेतावनी जारी करने से सुनामी रुक नहीं जाती। इंसान अपने लिए अलग-अलग मुल्कों के नाम से सीमाएं बनाकर बैठा है। प्रकृति की ताकत देखिए कि 4000 कि.मी. दूर इथोपिया से राख के बादल दो दिनों में दिल्ली आ गए। दरभंगा में अमित शाह ने कहा 5 साल में कोसी क्षेत्र को बाढ़ मुक्त कर देंगे। अमित शाह चाहे तो ज्वालामुखी भी रोक सकते हैं। कोसी की धार को जब रोक देंगे तब जरूर जाकर देखिएगा। 12,000 साल के सामने 5 साल तो कुछ भी नहीं। कब आ जाएगा पता भी नहीं चलेगा। अमित शाह हैं कुछ भी बोल सकते हैं। 5 साल पहले उन्होंने गुवाहाटी में कह दिया असम को बाढ़ मुक्त कर देंगे। जाइए जाकर देख आइए। अगर अमित शाह इथोपिया में होते तो यही कह रहे होते 5 साल में ज्वालामुखी मुक्त कर देंगे और जनता यकीन कर लेती। हमने अमित शाह का उदाहरण इसलिए दिया कि धरती के लिए 12,000 साल 12 सेकंड के समान हो सकते हैं। और अमित शाह के लिए 5 साल 12,000 साल के बराबर। इस पंक्ति को दोबारा सुनेंगे तो इसका मतलब कुछ-कुछ समझ सकते हैं। पूरा मतलब 20 साल बाद समझ आएगा। बाकी ज्ञानेश कुमार से शक्तिशाली इस धरती पर कोई नहीं। इंसान कब से बाढ़ रोकने में लगा है। बाढ़ का आना तो बंद हुआ नहीं।
इस धरती पर करोड़ों वर्षों से नदियां बहती आ रही हैं। हमने नदियों के पानी को खराब जरूर किया। प्रदूषित किया। अब साफ करने के नाम पर महान बनने निकले। कोई भी क्षेत्र बाढ़ मुक्त नहीं हो सकता और जिन नदियों का पानी साफ करने के नाम पर हजारों करोड़ रुपए बहा दिए गए उनका पानी साफ नहीं हुआ। हमारे समय के नायक इतना ही कर सकते हैं कि कहीं और से साफ पानी लाकर नदी के किनारे तालाब बना सकते हैं और भरी राजधानी में लोगों को झांसा दे सकते हैं। जैसा कि दिल्ली में हुआ और दिल्ली वालों ने देखकर अनदेखा कर दिया। प्रकृति के आगे नायक कौन हो सकता है? क्या हजारों साल से मौजूद जंगलों को काटने वाला आपका हीरो हो सकता है? ज्वालामुखी फटने की यह घटना चकित कर रही है। एक बार फिर से याद करने की जरूरत है कि धरती और प्रकृति की शक्ति के सामने मानव कुछ भी नहीं है। इंसान यही कर सकता है कि जहां ज्वालामुखी फट रहा है, रोपवे के जरिए इसके ऊपर से दर्शन कर सकता है और गर्व कर सकता है कि वह ज्वालामुखी देख रहा है। जहां ज्वालामुखी का फटना बंद हो जाता है, वहां लोग ट्रैक करने निकल पड़ते हैं। शायद चेक करने जाते होंगे कि ज्वालामुखी के ऊपर चल रहे हैं। उसे धरती पर खुद को विजेता की तरह देखने की आदत सी हो गई है। लेकिन 4500 किलोमीटर दूर ज्वालामुखी फटा तो दिल्ली मुंबई के हवाई जहाज को धरती पर उतार दिया गया। ज्वालामुखी का विस्फोट इतना शक्तिशाली होता है कि यह हवा में घूम रहे नाइट्रोजन को फिक्स कर देता है। यानी इससे निकली ऊर्जा से दो नाइट्रोजन एटम बम का बना मॉलिक्यूल टूट सकता है। टूट जाता है और नाइट्रेट बन जाता है। जिसका अलग-अलग प्राकृतिक क्रियाओं में इस्तेमाल होता है।
लैब के अंदर इंसान इस प्रक्रिया को 20वीं शताब्दी में ही इजाद कर पाया। 1909 में जर्मन वैज्ञानिक फ्रिट्स हाबर ने गैस सिलेंडर के अंदर नाइट्रोजन के एटम पर अत्यधिक दबाव डाला और फिर हाइड्रोजन के एटम को नाइट्रोजन के एटम के साथ जोड़कर लैब में अमोनिया बना दिया। इसे हाबर प्रोसेस कहा जाता है। ज्वालामुखी की राख जहरीली होती है लेकिन उर्वरक का काम भी करती है। इसके फटने के बाद जमीन उपजाऊ भी हो जाती है। समुद्र के पास ज्वालामुखी फटता है। नई जमीन बना देता है। टापू बन जाता है। कभी-कभी टापू खत्म भी हो जाता है। उससे निकला लावा जमकर पत्थर बन जाता है। कई तरह के मिनरल धरती के अंदर से बाहर आ जाते हैं। भूकंप की तरह ज्वालामुखी भी कई प्रकार के होते हैं। कुछ होते हैं जो फटने पर धमाके के साथ ऊपर की ओर लावा फेंकते हैं और कुछ ऐसे होते हैं जिनमें जगह-जगह से रिसाव या धमाका होता है। हेलीगुबी एक शील्ड ज्वालामुखी है। इसमें लावा धमाके के साथ बाहर नहीं आता। लेकिन पहाड़ी के ऊपर नदी की तरह बहता रहता है। आपने टीवी पर साइंस प्रोग्राम में इसके दृश्य देखे होंगे। 2022 में अमेरिका के हवाई में मोनालो नाम का ज्वालामुखी भी इसी तरह का शील्ड ज्वालामुखी था।
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शील्ड ज्वालामुखी जब फटता है तब इतना धुआं नहीं निकलता जितना कि हेलीगुब्बी के मामले में देखा जा रहा है। इसे लेकर भी वैज्ञानिकों में चर्चाएं चल रही हैं कि एक शील्ड ज्वालामुखी से इतना धुआं कैसे निकल रहा है। यह मुमकिन है कि इस इलाके की पर्याप्त वैज्ञानिक जांच नहीं हुई होगी और हेलीगुब्बी को ठीक से समझा नहीं गया होगा। अगर अमित शाह 5 साल में बाढ़ रोक सकते हैं तो मुझे उम्मीद है कि इस वीडियो की कुछ कमियों को आप दर्शक भी नजरअंदाज कर सकते हैं। आपकी इस उदारता पर मुझे बहुत भरोसा है।